भगवद्गीता के पहले अध्याय को 'अर्जुन विषाद योग' कहा जाता है, जो मानव इतिहास के सबसे गहन दार्शनिक संवादों में से एक की भूमिका बांधता है। जब कौरवों और पांडवों की सेनाएं कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध के लिए तैयार खड़ी होती हैं, तब योद्धा अर्जुन अपने सारथी भगवान कृष्ण से दोनों सेनाओं के बीच रथ ले जाने का अनुरोध करते हैं ताकि वे एक अंतिम दृष्टि डाल सकें। दोनों ओर अपने ही संबंधियों, गुरुओं और मित्रों को देखकर अर्जुन शोक और नैतिक असमंजस से भर उठते हैं। वे उस युद्ध के औचित्य पर प्रश्न उठाते हैं जो उनके अपने परिवार का विनाश करेगा, और निराशा में उनके हाथ से धनुष गिर जाता है। यह अध्याय किसी समाधान के लिए नहीं, बल्कि उस ईमानदार, गहराई से मानवीय संकट के लिए महत्वपूर्ण है जिसे यह प्रस्तुत करता है — वही संदेह, शोक और कर्तव्य तथा भावना के बीच का द्वंद्व जिसका सामना हर व्यक्ति जीवन के कठिन मोड़ों पर करता है। यही वह दुविधा है जिसका समाधान कृष्ण आगे के अध्यायों में देते हैं।